परमशिव एवं परब्रह्म
Author(s) -
इन्दु शर्मा
Publication year - 2019
Publication title -
dev sanskriti interdisciplinary international journal
Language(s) - Hindi
Resource type - Journals
eISSN - 2582-4589
pISSN - 2279-0578
DOI - 10.36018/dsiij.v3i0.33
Subject(s) - computer science
परमशिव एवं ब्रह्म दोनों ही भारतीय दर्शनों में परमसŸाा के रूप मे निरूपित हैं। एक का सम्बन्ध आगमों से है तथा दूसरे का सम्बन्ध वेदान्त से। अद्वैतवेदान्त में ब्रह्म की पूर्णतामूलक अवधारणा निषेधात्मक प्रतीत होती है क्योंकि उसमे कर्तृत्व व ज्ञातृत्व होते हुए भी स्वातन्त्र्य एवं बोध नहीं है। कर्तृत्व में स्वातन्त्र्य तथा विमर्श का और ज्ञातृत्व में बोध का एवं प्रकाश का सामरस्य आवश्यक है। तदपि यदि ब्रह्म में स्वातन्त्र्य को स्वीकार कर भी लिया जाए तो वह केवल अज्ञान का व्यावर्Ÿाक रूप ही होगा, साथ ही उसका स्वात्म विमर्शन नही होगा। इसके विपरीत परमशिव की ज्ञान क्रियामयता, प्रकाश विमर्शयता, चेतना, गतिमŸाा उसे एक विलक्षण परमसŸाा के रूप में सुस्थापित करती है। इस प्रकार “संविद्ब्रह्म” संज्ञा जहाँ इसकी विशेषता को आभासित करती है, वहीं दूसरी ओर वेदान्तियों के ब्रह्म से इसका वैषम्य भी द्योतित कर देती है कि “वेदान्त का ब्रह्म जड़ब्रह्म” है।
Accelerating Research
Robert Robinson Avenue,
Oxford Science Park, Oxford
OX4 4GP, United Kingdom
Address
John Eccles HouseRobert Robinson Avenue,
Oxford Science Park, Oxford
OX4 4GP, United Kingdom