श्रीअरविन्द के चिन्तन में चेतना की परामनोवैज्ञानिक अवधारणा
Author(s) -
Krishna Choudhary
Publication year - 2019
Publication title -
dev sanskriti interdisciplinary international journal
Language(s) - Hindi
Resource type - Journals
eISSN - 2582-4589
pISSN - 2279-0578
DOI - 10.36018/dsiij.v2i0.21
Subject(s) - medicine
श्रीअरविन्द के विचार में चेतना की परामनोवैज्ञानिक अवधारणा सर्वथा नये आयामों में प्रकट हुई है। चेतना के सन्दर्भ में उनके विचार भारतीय चिन्तनधारा की ही विस्तृत अभिव्यक्ति है। उनके चिन्तन में चेतना के विभिन्न प्रचलित अर्थों को नया स्वरूप मिला और उसके सूक्ष्म से सूक्ष्मतर स्तर की अभिव्यक्ति सम्भव हो सकी है। श्रीअरविन्द ने विशेष अर्थों में चेतना को चित्-शक्ति कहा है। उनकी चेतना संबंधी अवधारणा आधुनिक युग में भारतीय मनोविज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है और साथ ही पाश्चात्य मनोविज्ञान से उसका गहरा अन्तर भी स्पष्ट करती है। श्रीअरविन्द ने मानव जीवन में मानस चेतना का बहुत महत्त्व बतलाया है। वे मानस चेतना को विश्व चेतना से जोड़ने वाली अनिवार्य कड़ी मानते हैं। मानस चेतना को मानव जीवन के रूपान्तरण एवं उध्र्व विकास का अनिवार्य एवं महत्त्वपूर्ण केन्द्र मानकर वे इसके सूक्ष्मतम पहलुओं को उजागर करते हैं। मानस के सूक्ष्म तलों की विवेचना ही उनके परामनोवैज्ञानिक विचारों का स्वरूप है। इस सन्दर्भ में श्रीअरविन्द मानस चेतना के अतीन्द्रिय चार लोकों की विवेचना करते हैं एवं आधुनिक मनोविज्ञान के लिए मानवीय मन के उच्च भागों में नयी संभावनाओं को तलाशने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। मानस से अतिमानस के मध्य श्रीअरविन्द चेतना के विकास का विश्लेषण कर सर्वथा नई परामनोवैज्ञानिक अवधारणा की सृष्टि करते हैं।
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