
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र में भक्ति के साधनों का तुलनात्मक अध्ययन
Author(s) -
Shikha Rani
Publication year - 2018
Publication title -
dev sanskriti : interdisciplinary international journal (online)/dev sanskriti : interdisciplinary international journal
Language(s) - Hindi
Resource type - Journals
eISSN - 2582-4589
pISSN - 2279-0578
DOI - 10.36018/dsiij.v12i0.101
Subject(s) - computer science
प्रस्तुत षोध पत्र का उद्देष्य वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र में भक्ति के साधनों का तुलनात्मक अध्ययन करना है। भावनायें जीवन का आधार हंै। आज भावनात्मक अपरिश्कृति के कारण जीवन के सभी तलों पर समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं, भक्ति द्वारा इन सभी का समाधान संभव है। भक्ति भगवान के प्रति परम प्रेम है। नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र भक्ति संबंधी सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राचीन ग्रंथ है। नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र के तुलनात्मक अध्ययन पर कोई षोध कार्य तो नहीं हुआ है परन्तु नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र पर अलग-अलग कतिपय भाश्य अवष्य लिखे गये हैं। नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र के भक्ति प्राप्ति के साधनों को तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि इसमे कुछ समानतायें व कुछ असमानतायें हैं। नारद भक्ति सूत्र व षाण्डिल्य भक्ति सूत्र में भक्ति के साधनों मे यह समानता है कि दोनों में प्रेमा भक्ति की प्राप्ति का प्रमुख साधन भक्ति (भक्तिपरक साधनों) को ही माना गया है। नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र में यह असमानता है कि नारद भक्ति सूत्र में सामान्य स्तर के व्यक्तियों के लिए भक्ति के साधनों को वर्णित किया गया है जबकि षाण्डिल्य भक्ति सूत्र में सामान्य तथा पापी दोनों स्तर के व्यक्तियों के लिए भक्ति के साधन वर्णित किये गये हैं। नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र मंे दूसरी प्रमुख असमानता यह है कि नारद भक्ति सूत्र में भक्ति का साधन केवल भक्ति को जबकि षाण्डिल्य भक्ति सूत्र में ज्ञान व भक्ति दोनांे को माना है। व्यक्ति अपनी रूचि केे अनुसार नारद भक्ति सूत्र एवं षाण्डिल्य भक्ति सूत्र में बताये गये भक्ति के साधनों का अवलंबन लेकर प्रेमा भक्ति की प्राप्ति कर सकता है। निश्कर्श रूप में कहा जा सकता है कि भक्ति द्वारा भावनाओं का परम परिश्कार हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान समय की समस्त समस्याएँ अपना समाधान पा जाती हैं।